हाइलाइट्स
नीति से पछाड़ा विदेशियों को
एशियाई प्रतिस्पर्धियों को यूं दी मात
भारत में पश्चिमी एकाधिकार को दी चुनौती
राज एक्सप्रेस। चालाक चीन ने दूसरे एशियाई देशों के मुकाबले भारत में खुद को स्थापित करने स्पेशल रणनीति बनाई है। उसकी यह रणनीति इंडियन मार्केट में भली तरह सफल भी साबित हो रही है।
भारत में सफलता का राज?
इसे जानने के लिए हमें लेनोवो की नीति को समझना होगा। दरअसल भारत में लेनोवो की सफलता तीन या चार मूल्यों पर तय की जा सकती है। कई मायनों में उसी तर्ज पर जिस तरह कुछ सफल पश्चिमी कंपनियों ने भारत में काम किया।
अव्वल तो तीव्र मीडिया उपस्थिति और फिर वितरण पर अधिक गहन फोकस एवं खासकर एक मूल्य निर्धारण प्रस्ताव जो न तो बहुत सस्ता था और न ही बहुत महंगा। किसी कुशल प्रबंधन में यही तो सफल रणनीति की मूल बातें भी मानी जाती हैं।
लेकिन..एक कदम आगे -
इसके अलावा चीनियों ने एक और कदम आगे बढ़कर काम किया। चीनी कंपनियों ने जो काम दूसरी एशियाई कंपनियां न कर पाईं उस मामले में दखल दी। चीनी कंपनियों ने भारतीय अथवा वैश्विक प्रबंधकों को स्वतंत्र रूप से बिजनेस की बागडोर संभालने का जिम्मा भी सौंपा। चीनी कंपनियां प्रतिस्पर्धी एशियाई कंपनियों के मुकाबले काफी अलग हैं। इसे इन उदाहरणों से समझें -
भारत में श्याओमी के सीईओ भारतीय मूल के मनु कुमार जैन हैं।
Haier इंडिया के प्रेसिडेंट भारतीय मूल के एरिक ब्रैगैंज़ा हैं।
कोरियाई कंपनी सैमसंग इंडिया के सीईओ एचसी होंग (कोरियन) रहे।
एलजी इंडिया में सीईओ किम की वान (कोरियन) ने कंपनी की बागडोर संभाली।
सबसे पुराने जापानी ब्रांड्स में से एक सोनी इंडिया ने सुनील नैय्यर को 2018 में अपना पहला भारतीय सीईओ नियुक्त किया!
अंतर का कारण -
दूसरा लाभ जो चीनी ब्रांडों को अपने एशियाई प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबले मिला, वह यह है कि जापानी या कोरिया के विपरीत चीनी कंपनियां भारत से थोड़ा आगे थीं।
भारत की प्रति व्यक्ति आमद आज 12 साल पहले की चीन की प्रति व्यक्ति आमद की तरह ही है। कोरिया लगभग 38 साल पहले और जापान 50 साल पहले इस समान स्तर पर था।
ऐसा नहीं है कि अन्य एशियाई प्रतिद्वंद्वी भारतीय उपभोक्ता को नहीं समझते हैं; लेकिन यहां फर्क सिर्फ इतना है कि चीनी कंपनियों के लिए व्यापार बहुत आसान है क्योंकि उन्होंने हाल के दिनों में इसी तरह के बाजार में काफी लेनदेन किया है।
अंतर बुनियाद का -
इस मामले में सांस्कृतिक अंतर भी हैं। चीन में बॉलीवुड फिल्मों की सफलता भारतीय और चीनी के बीच के अंतर को रेखांकित करती है। यह अंतर भारत और कोरियाई या जापानी जनता की पसंद-नापसंद की तुलना में कहीं कम है।
उदाहरण के लिए, अनिश्चितता से बचाव (हॉफस्टेड पावर डिस्टेंस) पर, भारत और चीन बहुत समान हैं। यह चीनी कंपनियों को और अधिक खुलापन और स्वछंदता प्रदान करता है।
एक तरह से यह भारत के संचालन के तरीके के समान है। चीनी लोग भी पावर डिस्टेंस, पुरुषत्व और आसक्ति (अधिकतम 10 अंक अंतर) पर समान व्यवहार करते हैं।
भिन्नता की बात की जाए तो भारतीयों की तुलना में चीनी लोग कम व्यक्तिवादी और अधिक दीर्घकालिक उन्मुख हैं।
इसके परे अवधारणा है कि भारत भोग के मामले में कोरियंस की तरह जबकि व्यक्तिवाद के मामले में जापानियों की तरह समान व्यवहार रखता है।
व्यवसायिक अंतर -
लागत और डिजाइन पर भी नियंत्रण भिन्न है। जापानी और कोरियाई धीरे-धीरे अपने घरेलू देशों के बाहर विनिर्माण स्थानांतरित कर चुके हैं, जबकि चीन की कंपनियों ने ऐसा नहीं किया।
इस निर्णय ने चायनीज कंपनियों को भारी लागत लाभ और डिजाइन एवं विनिर्माण में अधिक लचीलेपन का अवसर दिया है। इसके अलावा चाइनीज कंपनियों के व्यवहार और सीखने के कुछ अनूठे तत्व भी हैं जो उन्हें भारत में अपनी सफलता को दोहराने में सक्षम बनाते हैं।
उन्होंने यह सब देखा है -
खर्च एवं प्रौद्योगिकी में उछाल - बाजार की सीमित समझ के साथ प्रतिस्पर्धा, पैमाने की आवश्यकता, पूंजी की कम लागत और इसी तरह की अन्य बातें। भारतीय बाजार इसी तरह का है जैसा कि कुछ साल पहले उनकी (चीन की) स्थिति थी।
मॉडल की समानता - चीन में काम करने वाले कई मॉडल भारत में भी काम करते हैं। डीप डिस्काउंट, माइक्रो-पेमेंट, फ्रीबीस, फेक अकाउंट, सेक्सुअली सजेस्टिव कंटेंट।
पैमाने की आवश्यकता - भारत की बड़ी आबादी चीनी कंपनियों के बड़े पैमाने वाली मानसिकता में भली तरह फिट बैठती है।
अत्यधिक अनुकूल दृष्टिकोण - भारतीय बाजार को बदलते व्यापार मॉडल में उच्च स्तर के लचीलेपन की आवश्यकता होती है और चाइनीज कंपनियां जरूरत के अनुसार बदलने के लिए सांस्कृतिक रूप से काफी अनुकूल होती हैं।
विनम्रता - वे काफी विनम्र हैं और अपने प्रतिद्वंद्वियों से शायद ही कभी बात करते हैं। यह उन्हें बदलाव के लिए बहुत अधिक खुला दिमाग प्रदान करता है।
कार्य नीति – एक तरह से भारतीय और चाइनीज कार्य नीति दोनों को अच्छी तरह से जोड़ती है। इससे चीन को भारत में किसी भी अन्य देश की तुलना में काम करना आसान हो जाता है।
चीनियों के बीच किस समझ की है बुनियादी कमी? भारतीय जन रणनीतिक रूप से कैसे सोचते हैं और कैसे राष्ट्रीय मूल्यों पर अटल हैं? किन बातों से चीन को भारत में रोका जा सकता है।" खास श्रृंखला में जानिये विस्तार से। आर्टिकल कितनी चिंता करना चाहिए भारत को चाइनीज कंपनियों से? में।
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डिस्क्लेमर – आर्टिकल प्रचलित रिपोर्ट्स पर आधारित है। इसमें शीर्षक-उप शीर्षक और संबंधित अतिरिक्त प्रचलित जानकारी जोड़ी गई हैं। इस आर्टिकल में प्रकाशित तथ्यों की जिम्मेदारी राज एक्सप्रेस की नहीं होगी।
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